हम नहीं तुम कहलाते बाज़ीगर

Avishek Sahu
December 17, 2018

इतनी धुप कभी हुई नहीं थी जितनी आज हमने बागानों में देखी,

हाँ ये बात और है की जिस दिन देखी उस दिन किसी ने घर में रोटी नहीं सेकी ,

क्यों के रोटी तो सेकाई जाती है खाने वालों के भूक मिटाने,

पर हम तो आ गए थे खाने वाले के नाम से अपनी बची कुछ इज़्ज़त लुटाने,

लुटाने इस लिए आ गए थे क्यों की जिसकी इज़्ज़त नहीं लुटी उसकी गाड़ी नहीं छूटी,

और जिसकी गाड़ी नहीं छूटी उसकी तो मान लो तकदीर हो गयी एकदम फूटी,

अब गाड़ी न चलाए चले जाएं इसमें थोड़ी न है वो नशीली सी मज़ा,

जो मज़ा आती है गियर हड़काने में और झेलते हुए दूर से आसमान की सज़ा,

के जब तक भागोगे मुझको तुम हमेशा ऊपर ही पाओगे,

छत बना लो ऊंचा सा फिर भी मुझसे तुम दूर ना कभी जाओगे,

अंग्रेजी कपड़े पहन के तुम झूम लो फट से आज बराबर,

पर कपड़ों के पीछे क्या है छुपा लेते, तो हम नहीं तुम कहलाते बाज़ीगर।