लुत्फ़ मदारी का

Avishek Sahu
December 11, 2018

सज़ा तो हमें तब सुनाई दी थी जब हम अपनी इज़्ज़त बचा रहे थे,

अब ये कैसी सज़ा थी जो इज़्ज़त बचाने वाले को मज़ा चखा रहे थे,

अबे बकचोदी करना है तो ऐसे करो के सामने वाले भी बकचोद बनना चाहे

ये क्या बात हुई के आप के ख़ौफ़ से, बादशाह भी प्रतिशोद करना चाहे

अब बादशाह हैं बादशाही के खातिर हिसाब तो रखना पड़ेगा,

इतनी अगर हज़म न हुई तो समझो आपको भी किताब पढ़ना पड़ेगा,

अब किताब पढ़के अगर आपकी शान पे आंच आ गयी,

उस शान को उस बाज़ार में बेच देना जहाँ उस रोज़ कांच भा गयी

 

कांच को तो हमें यूँ ही खींच के देना है,

साली शकल दिखाके बोलती है बस ऎसे ही तेरा लेना है,

अरे जा चुड़ैल देखा है हमने भी तेरा दोगलापन कड़ी धुप में,

सिमट न जाएंगे हम तो अपने शेर के पूप में,

पूप तो हम ऐसे ही उठाते हैं अपनी औकात खुद को दिखाने को,

बहक न जाए हम फिर जब आप बुलाएँगे हमें चखाने को,

उस पतली गली की नफ़रत जहाँ हम चखे थे लुत्फ़ मदारी का,

और उस कांच का होंठ चूमके बड़ा बना हुआ व्यापारी का।