मतलब, हैवानियत।

Avishek Sahu
August 27, 2018

मतलब कभी ढूंडा था मैंने यूहीं कांटों के रस्तों पे चलते चलते,

नाक में दम कर रखा था ये दिल ज़ख्मों पे नमक मलते मलते,

बोला यूहीं नहीं मिल गया तुझे सुकून उन नटखट रातों की बातों में,

और यूहीं नहीं बच गया था तू उन बातों से भरी मुलाकातों में।

अब इतना ना बौखलाते जा तू भीख के सरहदों पे रेंगते हुए,

इतना भी होती अक्कड़ तो घरवालों को ना मिलता फेंकते हुए,

फेंक के हो जाता अगर तू बादशाह उन अनजाने शहरों का,

तो ना धड़कता में इतनी ज़ोर जब आया था फरमान बेहरों का।

इतने में मैं भी गया सटिया सा दिल के बाहों में,

बोला ये ना समझ लेना तू चल गया हूं मैं तेरी राहों में,

ज़ुल्म को तो रखना था साथ जबसे उस रात आंखें यूहीं लड़क गई,

अब मतलब इतना भी ना समझे रात तो समझो हैवानियत यूहीं सरक गई।