गुरु बेशर्मी में, भाई बेरहमी में

Viper Inc.
January 23, 2019

कब से बैठे हैं उस धुन की राह में, जिस धुन की गूँज कभी बचपन में आती थी,

ऐसे ही बागीचे में टहलते टहलते मंदिर को जहाँ भेंट अर्चन की जाती थी,

जिस अर्चन के किस्से सुन कर कभी कोई इस तरफ टहलने आया था,

जब ऐसे ही इधर उधर कुछ घटायें छाई थी और किसी ने उसका मज़ाक उड़ाया था,

 

की है तो वो सूअर उन कमसिन पतली गलियों का, जहाँ दूर तक सब एक नज़र आते हैं,

जहाँ से अभी भी आती है गूँज उसकी सालियों का, जहाँ रेल आसमानों में गुज़र जाते हैं,

आसमान जो फँस गए थे एक जंजाल में जब पुकार उस मंदिर की आयी थी,

जिस मंदिर की नींव उसको रात रात भर उन पतली गलियों में सतायी थी,

 

अब क्या करें सूअर जो है सूअर का फ़र्ज़ अदा करना तो पड़ेगा,

बीवी हो या साली बगल में, जो लिया है शगुन में उसको भरना तो पड़ेगा,

अब मज़ाक में क्या है, कटने वालों को तो ज़िल्लत से डर लगता है,

फिर ज़िल्लत अगर नाकामी की हो तो समझो किल्लत का सर जगता है,

 

तो उड़ा लो मज़ाक फिर से चाहे हो तुम देसी या हो कोई शैख़ अरब का

सूअर तो सूअर होता है बन जाता है वो कैदी गज़ब का,

बन्दर से पूछ लो कटने के लिये तो वो आज भी बेशर्मी में आगे है,

और बात जब आती है लेने की तो समझो बेरहमी में वो हमरे भाई लागे है।