बिकी हुई फुलझड़ी

Avishek Sahu
November 22, 2018

बुज़दिलों को पूछो इतनी सर्दी में सर कहाँ छिपाई जाती है

पता लगेगा इन दिनों तो दोस्तों यहाँ पागलपन सिखाई जाती है

अजी सर्दी जो है ये उस तरीके की जो तरीका कोई सालों पहले आज़माया करता था

लिपट गयी फिर आग में जो झुलस के कल कम्बख्त नौकरी फरमाया करता था

अब नौकरी ही है नौकरी की खातिर हमने तो पापड़ बेलने से कभी ना नहीं कही

फिर भी अगर खुंदस भरी पड़ी हो तो समझो हमने पापड़ को भी कभी हाँ नहीं कही

अरे पापड़ में है ऎसा भी क्या जुलूस जो बिन तोड़े चावल हज़म नहीं हो सकती

हम तो चावल बस दाल के साथ लपेट लें जब तक पागल ज़ख्म नहीं धो सकती

धोना है तो धो ले बराबर हम में क्या खुंदस ख़ाक पड़ी है

अपनी गर्मी खुद संभाल लेती तो समझो सर्दी में आँख लड़ी है

पर सर्दी तो यहाँ की है आखिर उस तरीके की दूसरी नुमाइश

इतनी अकड़ अगर होती आप में तो कम्बख्त इश्क़ भी होती हमारी खुवाईश

इतने में शैतान जाग उठा और बोला हमें नहीं करना ये बड़े लोगों की उच्च समाज से बात

हम तो बस बेबस बना दिए गए ये देखने आखिर कितनी ज़हरीली हो सकती है रात

रात की खौफ नापो तो शायद समझ में आएगा रात तो बनी थी ज़हर पालने

वरना दिन में तो हम भी हीरो बन गए थे निकले थे जब चाँद का शहर उबालने

अब उबल गयी तो उबल गयी समझो रात को भी आज कल हीरो बनने की पड़ी है

क्या करें लोगा बाता करता है कल युग ख़तम करने की पर हमारे हाथ में तो बिकी हुई फुलझड़ी है।